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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स समिट के ओपन सेशन को संबोधित करते हुए कहा कि मौजूदा दौर में दुनिया तेजी से बदल रही है और विभिन्न क्षेत्रों में तनाव लगातार बढ़ रहा है। इसका असर केवल सरकारों और अर्थव्यवस्थाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम लोगों के जीवन, रोजगार, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा उपलब्धता और विकास की गति पर भी पड़ता है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में महामारी, जलवायु आपदाओं और सप्लाई चेन में आई रुकावटों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आज की आपस में जुड़ी दुनिया में कोई भी संकट केवल एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं रह सकता।
प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया के देशों के बीच बढ़ती परस्पर निर्भरता के दौर में सामूहिक प्रयासों और सहयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। ऐसे समय में ब्रिक्स जैसे मंचों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, जहां अलग-अलग परिस्थितियों, आर्थिक क्षमताओं और विकास के अनुभव वाले देश एक साथ बैठकर साझा चुनौतियों का समाधान तलाश सकते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स के काम को चार प्रमुख स्तंभों—रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन और सस्टेनेबिलिटी—के आधार पर आगे बढ़ाया गया है। इन चारों क्षेत्रों को केंद्र में रखते हुए साझा सोच को ठोस पहलों और ऐसे सहयोग में बदलने का प्रयास किया गया है, जिससे सदस्य देशों के साथ-साथ व्यापक वैश्विक समुदाय को भी लाभ मिल सके।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन की शुरुआत ब्रिक्स के विस्तृत परिवार में शामिल सभी देशों और प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए की। उन्होंने कहा कि आज का सभागार अलग-अलग देशों, संस्कृतियों, परंपराओं और विकास के अनुभवों को एक मंच पर जोड़ रहा है। यह ब्रिक्स की बढ़ती ताकत, उसकी उपयोगिता और उसके प्रति दुनिया के विभिन्न देशों के बढ़ते विश्वास का प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि ब्रिक्स का विस्तार केवल सदस्य देशों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मंच के प्रभाव और जिम्मेदारी को भी बढ़ाता है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिस्थितियों से आने वाले देशों का एक साथ आना वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श को और व्यापक बनाता है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स के एजेंडे को चार प्रमुख स्तंभों के आधार पर आगे बढ़ाया गया। इन स्तंभों का उद्देश्य केवल चर्चा करना नहीं, बल्कि साझा विजन को व्यावहारिक और परिणाम देने वाले सहयोग में बदलना है। उन्होंने कहा कि सभी सदस्य देशों के सहयोग से ऐसी पहलों को आगे बढ़ाया गया है, जिनका लाभ साझा रूप से उठाया जा सके।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ग्लोबल साउथ के देशों का ब्रिक्स पर भरोसा लगातार मजबूत हुआ है। इसका प्रमुख कारण यह है कि इस मंच पर विकासशील देशों की आवाज को महत्व मिलता है और उनके अनुभवों, चुनौतियों तथा प्राथमिकताओं को भी चर्चा का हिस्सा बनाया जाता है।
उन्होंने कहा कि विकासशील देशों के सामने खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, वित्तीय संसाधन और तकनीकी पहुंच जैसी अनेक चुनौतियां हैं। इन समस्याओं का समाधान तभी संभव है जब वैश्विक संस्थाओं और बहुपक्षीय मंचों पर सभी देशों की भागीदारी और उनकी चिंताओं को उचित स्थान मिले।
पीएम मोदी ने कहा कि ब्रिक्स की वास्तविक ताकत उसकी विविधता में है। अलग-अलग आर्थिक परिस्थितियों, भौगोलिक क्षेत्रों और सामाजिक अनुभवों वाले देशों का एक साथ आना इस समूह को अधिक प्रभावशाली बनाता है। उन्होंने कहा कि आपसी सम्मान, सहयोग और साझा हितों के आधार पर आगे बढ़ना ब्रिक्स की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया में बढ़ते तनाव के बीच यह समझना जरूरी है कि किसी एक देश में उत्पन्न संकट का असर दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है। महामारी ने स्वास्थ्य संकट के साथ-साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था और आपूर्ति व्यवस्था को प्रभावित किया। इसी तरह जलवायु आपदाओं का प्रभाव कृषि, खाद्य आपूर्ति, रोजगार और लोगों के विस्थापन तक दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि सप्लाई चेन में छोटी-सी रुकावट भी कई देशों में उत्पादन और बाजार को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में वैश्विक समुदाय को केवल संकट आने के बाद प्रतिक्रिया देने की बजाय पहले से तैयारी करने की दिशा में काम करना होगा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि रेजिलिएंस का अर्थ केवल संकट का सामना करना नहीं है, बल्कि संकट से पहले उसकी आशंका को समझना, संभावित नुकसान को कम करना और संकट के बाद तेजी से सामान्य स्थिति बहाल करने की क्षमता विकसित करना भी है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि इसी सोच के तहत भारत ने ब्रिक्स देशों को संभावित संकटों से निपटने के लिए पहले से तैयार रखने पर विशेष जोर दिया है। संक्रामक बीमारियों के फैलाव को समय रहते पहचानने और उससे निपटने के लिए 'ब्रिक्स इंटीग्रेटेड अर्ली वार्निंग सिस्टम' बनाने पर सहमति बनी है।
उन्होंने कहा कि इस तरह की व्यवस्था के माध्यम से विभिन्न देशों के बीच जानकारी और अनुभवों को साझा करना आसान होगा। किसी बीमारी के संभावित प्रसार की प्रारंभिक जानकारी मिलने पर समय रहते कदम उठाने से बड़े स्वास्थ्य संकट को रोकने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा आपदाओं से निपटने के लिए अर्ली वार्निंग डेटा इंटीग्रेशन गाइडलाइंस तैयार की गई हैं। इसका उद्देश्य आपदा से जुड़ी सूचनाओं के बेहतर इस्तेमाल और विभिन्न स्तरों पर समन्वय को मजबूत करना है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाओं के बीच शुरुआती चेतावनी और समय पर कार्रवाई से जनहानि तथा आर्थिक नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने छोटे और मध्यम उद्यमों को लेकर भी भारत की प्राथमिकता स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि एमएसएमई किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं और बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर पैदा करते हैं। ऐसे उद्यमों को ज्ञान, वित्त और नए बाजारों से जोड़ना आवश्यक है।
इसी उद्देश्य से ब्रिक्स एमएसएमई कोऑपरेशन पोर्टल की पहल की गई है। इससे सदस्य देशों के छोटे उद्यमों के बीच संपर्क और सहयोग के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।
उन्होंने कहा कि छोटे उद्यमों के लिए केवल वित्तीय सहायता पर्याप्त नहीं है। उन्हें आधुनिक तकनीक, बाजार की जानकारी, प्रशिक्षण, नवाचार और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार के अवसर भी उपलब्ध कराने होंगे। ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि तेजी से हो रहे शहरीकरण के बीच शहरों के सामने परिवहन, प्रदूषण, यातायात, सार्वजनिक परिवहन और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी चुनौतियां बढ़ रही हैं। इन समस्याओं का समाधान खोजने के लिए एक-दूसरे के अनुभवों से सीखना जरूरी है।
इसी उद्देश्य से ब्रिक्स अर्बन मोबिलिटी हब की स्थापना की गई है। इसके माध्यम से सदस्य देशों के शहरों के बीच बेहतर शहरी परिवहन और मोबिलिटी से जुड़ी बेस्ट प्रैक्टिस साझा की जा सकेंगी।
उन्होंने कहा कि शहरों की समस्याएं भले ही अलग-अलग दिखाई दें, लेकिन कई चुनौतियां समान होती हैं। सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना, यातायात को सुगम करना और लोगों को सुरक्षित तथा टिकाऊ परिवहन उपलब्ध कराना आज सभी बड़े शहरों की प्राथमिकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारतीय सभ्यता में प्रकृति को मां का दर्जा दिया गया है। भारत की परंपरा में प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलने पर हमेशा जोर दिया गया है। उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विकल्प नहीं माना जा सकता। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
उन्होंने कहा कि तेज आर्थिक विकास आवश्यक है, लेकिन विकास की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो। वर्तमान पीढ़ी की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों और आवश्यकताओं का भी ध्यान रखना होगा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि यही सस्टेनेबिलिटी का मूल आधार है और भावी पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।
प्रधानमंत्री ने ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था को अधिक भरोसेमंद, कुशल और सभी के लिए सुलभ बनाना जरूरी है।
इसके लिए स्मार्ट ग्रिड्स और एनर्जी स्टोरेज के क्षेत्र में ब्रिक्स डिजिटल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया गया है। इससे स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों को अधिक विश्वसनीय और प्रभावी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
उन्होंने कहा कि दुनिया में ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के साथ-साथ ऊर्जा भंडारण और वितरण की आधुनिक व्यवस्था विकसित करना भी आवश्यक है।
प्रधानमंत्री ने कृषि क्षेत्र में भी सहयोग की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और बदलते मौसम का सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है। ऐसे में कृषि को अधिक टिकाऊ और मौसम के अनुकूल बनाने की जरूरत है।
उन्होंने एग्रो इकोलॉजी और रिजेनरेटिव एग्रीकल्चर के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके माध्यम से पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में किसानों और स्थानीय समुदायों के पास प्रकृति तथा कृषि से जुड़ा सदियों पुराना अनुभव है। इस ज्ञान को आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ जोड़कर अधिक टिकाऊ कृषि व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
पीएम मोदी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल बड़े स्तर की नीतियां पर्याप्त नहीं हैं। स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है।
उन्होंने कम्युनिटी बेस्ड क्लाइमेट एडाप्टेशन के लिए तैयार किए गए सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि स्थानीय और इंडिजिनस नॉलेज को जलवायु कार्रवाई का महत्वपूर्ण आधार बनाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदाय अपने क्षेत्र की जलवायु, प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरणीय परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझते हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की रणनीति बनाते समय उनके अनुभवों को शामिल किया जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज तकनीक केवल आर्थिक विकास का माध्यम नहीं है, बल्कि यह देशों को एक-दूसरे के करीब लाने का भी महत्वपूर्ण साधन है। डिजिटल तकनीक के माध्यम से ज्ञान, अनुभव और विशेषज्ञता का तेजी से आदान-प्रदान किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच तकनीकी सहयोग को और मजबूत करने की आवश्यकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य तकनीक, कृषि तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग से विकास की गति तेज की जा सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ब्रिक्स के माध्यम से भारत ने समावेशी वैश्विक विकास को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में सभी देशों को समान अवसर मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दुनिया में विकास तभी टिकाऊ हो सकता है, जब उसमें गरीब और विकासशील देशों की जरूरतों को भी प्राथमिकता दी जाए। आर्थिक विकास के साथ रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक और सामाजिक सुरक्षा पर भी ध्यान देना होगा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि ब्रिक्स के माध्यम से विकसित किए जा रहे समाधान केवल ब्रिक्स देशों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। यदि किसी पहल से वैश्विक समुदाय को लाभ हो सकता है, तो उसे व्यापक स्तर पर साझा किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में साझा चुनौतियों का सामना अलग-अलग होकर नहीं किया जा सकता। महामारी, जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दे सीमाओं से बंधे नहीं हैं।
ऐसे में देशों के बीच सहयोग, अनुभवों का आदान-प्रदान और तकनीकी साझेदारी ही भविष्य की चुनौतियों से निपटने का प्रभावी रास्ता हो सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ब्रिक्स की मजबूती आपसी विश्वास और सहयोग पर निर्भर करती है। सदस्य देशों के बीच संवाद बढ़ने से साझा हितों के क्षेत्रों में नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।
उन्होंने कहा कि विविधता ब्रिक्स की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत है। अलग-अलग दृष्टिकोणों के बावजूद साझा मुद्दों पर साथ मिलकर काम करना इस मंच को और प्रभावी बनाता है।
प्रधानमंत्री ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में ब्रिक्स के सदस्य देश स्वास्थ्य, ऊर्जा, जलवायु, तकनीक, कृषि, व्यापार और शहरी विकास सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करेंगे।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में किसी भी देश की सुरक्षा और समृद्धि को दूसरे देशों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। दुनिया जितनी तेजी से एक-दूसरे से जुड़ रही है, उतनी ही तेजी से साझा चुनौतियां भी बढ़ रही हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसे समय में बहुपक्षीय सहयोग केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। देशों को एक-दूसरे के अनुभवों से सीखते हुए ऐसी व्यवस्थाएं तैयार करनी होंगी, जो आने वाले संकटों का सामना करने में सक्षम हों।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत की सोच में विकास का अंतिम उद्देश्य मानव कल्याण है। आर्थिक प्रगति, तकनीकी विकास और बुनियादी ढांचे के विस्तार का वास्तविक लाभ तभी है, जब इससे लोगों का जीवन बेहतर बने।
उन्होंने कहा कि भारत ने ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान जिन पहलों पर जोर दिया है, उनमें भी यही सोच दिखाई देती है। चाहे स्वास्थ्य संकट से निपटने की व्यवस्था हो, एमएसएमई को बढ़ावा देना हो, शहरों की मोबिलिटी सुधारनी हो या स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना—हर क्षेत्र में आम लोगों को केंद्र में रखा गया है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया के सामने आने वाली चुनौतियां जटिल हैं, लेकिन सामूहिक प्रयासों से उनका समाधान संभव है। इसके लिए देशों के बीच विश्वास, सहयोग और ज्ञान का आदान-प्रदान बढ़ाना होगा।
उन्होंने कहा कि ब्रिक्स के चार स्तंभ—रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन और सस्टेनेबिलिटी—भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इन स्तंभों के आधार पर तैयार किए गए समाधान वैश्विक विकास को अधिक समावेशी, टिकाऊ और मानवीय बनाने में मदद कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज जरूरत ऐसी वैश्विक व्यवस्था बनाने की है, जिसमें संकट आने पर कोई देश अकेला न रह जाए और विकास की प्रक्रिया में कोई क्षेत्र पीछे न छूटे। ब्रिक्स इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में अपनी भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने कहा कि भारत का प्रयास रहा है कि ब्रिक्स के माध्यम से ऐसी पहलों को आगे बढ़ाया जाए, जिनसे सदस्य देशों के बीच सहयोग मजबूत हो और वैश्विक दक्षिण के देशों की आवाज को भी प्रभावी मंच मिले। भारत का मानना है कि साझा चुनौतियों का सामना साझा प्रयासों से ही किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि ब्रिक्स देश आने वाले समय में भी मिलकर काम करेंगे और ऐसी साझेदारी विकसित करेंगे, जो न केवल वर्तमान चुनौतियों का समाधान दे बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और समावेशी दुनिया की नींव भी मजबूत करे।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


