17 सितंबर से मथुरा में शुरू होगा सेवा संकल्प अभियान, 5 लाख दीपों से जगमगाएंगे धार्मिक स्थल
- 10h ago
नई दिल्ली। 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत ने वैश्विक शासन व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत को एक बार फिर मजबूती से उठाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार को अब और टालने से साफ इनकार करते हुए कहा कि यूएनएससी में सुधार की प्रक्रिया को निश्चित समयसीमा और ठोस परिणामों से जोड़ना होगा। उन्होंने कहा कि दुनिया की मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकता वैश्विक संस्थाओं की मौजूदा संरचना में पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं देती। ऐसे में वैश्विक संस्थानों में प्रतिनिधित्व बढ़ाना समय की जरूरत है।
भारत मंडपम में ब्रिक्स सदस्य देशों के प्रतिनिधियों के स्वागत के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि ग्लोबल साउथ आज वैश्विक संगठनों में आगे की कतार में दिखाई देता है, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में अभी भी पीछे है। उन्होंने कहा कि दुनिया को ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जिसमें हर देश की आवाज सुनी जाए और हर सदस्य की भागीदारी सुनिश्चित हो।
प्रधानमंत्री ने इसी दिशा में ग्लोबल गवर्नेंस रिफॉर्म के लिए 10 प्रस्ताव तैयार करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि इन प्रस्तावों को अगले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन तक एक व्यापक 'ब्रिक्स रिफॉर्म रोडमैप' का रूप दिया जा सकता है। इसके लिए प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाने जैसे तीन प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के मुद्दे पर भारत की पुरानी मांग को एक बार फिर मजबूती से सामने रखा। उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार को अब और लंबा नहीं खींचा जा सकता। इसके लिए लिखित बातचीत को निश्चित समयसीमा और स्पष्ट परिणामों से जोड़ना जरूरी है।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार और उसमें विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्व दिए जाने की वकालत करता रहा है। भारत का तर्क है कि मौजूदा वैश्विक संस्थागत ढांचा आज की दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं का पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं करता।
प्रधानमंत्री का संदेश साफ था कि यदि वैश्विक संस्थाओं को भविष्य की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटना है तो उनमें निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाना होगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक शासन व्यवस्था की मौजूदा संरचना की तुलना एक पिरामिड से की। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में निर्णय लेने की ताकत और विशेषाधिकार कुछ देशों और संस्थाओं के शीर्ष स्तर पर केंद्रित हैं, जबकि निचले स्तर पर मौजूद अनेक देश उन फैसलों से सीधे प्रभावित होते हैं।
उन्होंने कहा कि अब 'विशेषाधिकार के पिरामिड' को 'साझेदारी के मंच' में बदलना होगा। ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए जहां हर देश की आवाज सुनी जाए, हर सदस्य की हिस्सेदारी हो और मानवता की प्रगति वैश्विक प्रयासों के केंद्र में रहे।
प्रधानमंत्री ने कहा कि ग्लोबल साउथ को केवल वैश्विक फैसलों का लाभार्थी नहीं, बल्कि फैसले लेने की प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाना होगा।
पीएम मोदी ने कहा कि ब्रिक्स देशों को मिलकर वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार के लिए 10 प्रस्ताव तैयार करने चाहिए। उनका सुझाव है कि इन प्रस्तावों को अगले शिखर सम्मेलन तक एक व्यापक सुधार रोडमैप में बदला जाए।
इस रोडमैप में तीन मुख्य आयामों को केंद्र में रखने की बात कही गई है—
पहला—प्रतिनिधित्व। वैश्विक संस्थाओं में सभी क्षेत्रों और आर्थिक शक्तियों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
दूसरा—जवाबदेही और त्वरित प्रतिक्रिया। वैश्विक संस्थाओं को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अधिक प्रभावी और उत्तरदायी बनाना।
तीसरा—नियम निर्माण। भविष्य की तकनीकों और वैश्विक चुनौतियों से जुड़े नियम बनाने में विकासशील देशों की भी बराबर भागीदारी सुनिश्चित करना।
प्रधानमंत्री ने केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक सुधारों की मांग सीमित नहीं रखी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में भी बदलाव की जरूरत बताई।
उन्होंने कहा कि वित्तीय संस्थानों में वोटिंग पावर, नेतृत्व के पद और आर्थिक नीतिगत प्राथमिकताएं आज की आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप होनी चाहिए। जिन देशों का वैश्विक अर्थव्यवस्था को गति देने में महत्वपूर्ण योगदान है, उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी उचित भूमिका मिलनी चाहिए।
भारत का यह रुख वैश्विक वित्तीय संस्थानों में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने की व्यापक मांग से जुड़ा है।
पीएम मोदी ने कहा कि भविष्य में नियम कौन बनाएगा, यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रिटिकल टेक्नोलॉजी और अन्य उभरती तकनीकें आने वाले समय की नीतियों और नियमों को प्रभावित करेंगी।
ऐसे में ग्लोबल साउथ केवल इन तकनीकों के नियमों का पालन करने वाला पक्ष न बने, बल्कि नियम बनाने की प्रक्रिया में भी उसकी भूमिका होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को 'रूल मेकर' बनाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। भारत इस दिशा में नेतृत्व करने के लिए तैयार है।
प्रधानमंत्री ने भविष्य की वैश्विक व्यवस्था में तकनीक की बढ़ती भूमिका को भी रेखांकित किया। एआई, डिजिटल तकनीक, क्रिटिकल और उभरती तकनीकों का प्रभाव अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और शासन समेत लगभग हर क्षेत्र पर पड़ रहा है।
ऐसे में इन तकनीकों के इस्तेमाल और नियमन को लेकर बनने वाले वैश्विक नियमों में विकासशील देशों की आवाज जरूरी है। भारत लगातार समावेशी और जिम्मेदार तकनीकी विकास की वकालत करता रहा है।
ब्रिक्स के मंच से इस मुद्दे को उठाकर भारत ने यह संकेत दिया कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था केवल पारंपरिक राजनीतिक संस्थाओं तक सीमित नहीं होगी, बल्कि तकनीकी और डिजिटल शासन भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक संस्थाओं की जवाबदेही के संदर्भ में समुद्री क्षेत्र से जुड़े लोगों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार में सीफेयर यानी समुद्री कर्मचारियों का महत्वपूर्ण योगदान है, लेकिन मुश्किल परिस्थितियों में उन्हें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या वैश्विक स्तर पर कोई ऐसी आपात समुद्री व्यवस्था बनाई जा सकती है, जो संकट की स्थिति में सीफेयर की मदद कर सके।
यह प्रस्ताव वैश्विक व्यापार की उस बुनियादी व्यवस्था की ओर ध्यान आकर्षित करता है, जिसमें समुद्री परिवहन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया के बड़े हिस्से का अंतरराष्ट्रीय व्यापार समुद्री मार्गों से होता है, इसलिए समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा और आपातकालीन सहायता भी वैश्विक सहयोग का महत्वपूर्ण विषय बन सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स की दो दशक की यात्रा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पिछले 20 वर्षों में ब्रिक्स ने वैश्विक मंच पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।
उन्होंने कहा कि संगठन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसके सदस्य देश एक-दूसरे के दृष्टिकोण का सम्मान करते हैं और सहमति के आधार पर आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।
अब जरूरत इस बात की है कि ब्रिक्स के भीतर बनी एकता और सहमति को वैश्विक मंच पर ठोस परिणामों में बदला जाए।
पीएम मोदी ने ब्रिक्स के अगले 20 वर्षों के लिए महत्वाकांक्षी एजेंडा तैयार करने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि संगठन को अपनी संस्थागत व्यवस्था को और मजबूत करना होगा।
ब्रिक्स की अध्यक्षता हर वर्ष बदलती है। ऐसे में एक देश से दूसरे देश को अध्यक्षता हस्तांतरित होने के बाद भी संगठन की प्रमुख पहलों और फैसलों में निरंतरता बनी रहनी चाहिए।
प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसी मजबूत व्यवस्था बनाने की जरूरत है, जिससे अध्यक्षता बदलने के बावजूद ब्रिक्स की संस्थागत प्रगति प्रभावित न हो।
पीएम मोदी ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान किए गए कार्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत ने ब्रिक्स सहयोग को केवल सरकारों और सरकारी संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय आम लोगों से जोड़ने का प्रयास किया।
इसी सोच के तहत भारत की अध्यक्षता के दौरान 350 से अधिक बैठकें आयोजित की गईं। करीब 30 शहरों में सदस्य देशों की टीमों का स्वागत किया गया।
उन्होंने कहा कि भारत की कोशिश रही कि ब्रिक्स की गतिविधियों का लाभ और प्रभाव व्यापक समाज तक पहुंचे तथा संगठन का सहयोग जन-केंद्रित बने।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान चार प्रमुख प्राथमिकताओं को केंद्र में रखा गया—रेजिलियंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन और सस्टेनेबिलिटी।
उन्होंने कहा कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में देशों के लिए मजबूत और लचीली व्यवस्था बनाना जरूरी है। इसके साथ ही नवाचार, आपसी सहयोग और सतत विकास को आगे बढ़ाना भी आवश्यक है।
भारत ने ब्रिक्स के माध्यम से इन क्षेत्रों में सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने का प्रयास किया।
पीएम मोदी ने कहा कि ब्रिक्स का प्रभाव तभी व्यापक होगा जब इसका सहयोग आम नागरिकों तक पहुंचे। इसी उद्देश्य से भारत ने अध्यक्षता के दौरान विभिन्न क्षेत्रों और शहरों में कार्यक्रम आयोजित किए।
इससे ब्रिक्स को केवल उच्चस्तरीय राजनीतिक और आर्थिक मंच के बजाय लोगों के बीच सहयोग का माध्यम बनाने का प्रयास किया गया।
भारत की ओर से यह संदेश देने की कोशिश की गई कि वैश्विक सहयोग का अंतिम उद्देश्य आम नागरिकों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना होना चाहिए।
ब्रिक्स के विस्तार के बाद संगठन का वैश्विक प्रभाव और दायरा पहले की तुलना में व्यापक हुआ है। ऐसे में भारत लगातार यह रेखांकित कर रहा है कि ब्रिक्स को विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने वाले मंच के रूप में आगे बढ़ना चाहिए।
प्रधानमंत्री मोदी का भाषण इसी सोच को आगे बढ़ाता दिखाई दिया। उन्होंने वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक संस्थानों में सुधार और नई तकनीकों के नियमों में विकासशील देशों की भागीदारी को एक ही व्यापक दृष्टिकोण से जोड़कर पेश किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि वैश्विक संस्थाओं में लोगों का विश्वास तभी मजबूत होगा जब वे बदलती परिस्थितियों के अनुरूप सामूहिक प्रतिक्रिया देने में सक्षम होंगी।
उन्होंने वैश्विक संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, उत्तरदायी और प्रभावी बनाने की जरूरत पर जोर दिया। उनका कहना था कि दुनिया की वर्तमान चुनौतियां सीमाओं से परे हैं और इनके समाधान के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।
जलवायु परिवर्तन, तकनीकी बदलाव, वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा, आर्थिक अस्थिरता और उभरती सुरक्षा चुनौतियां ऐसे विषय हैं जिन पर किसी एक देश के प्रयास पर्याप्त नहीं हो सकते।
ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि भारत ने केवल सुधार की मांग नहीं की, बल्कि सुधार के लिए रोडमैप तैयार करने का प्रस्ताव भी रखा।
10 प्रस्तावों के जरिए वैश्विक शासन व्यवस्था में बदलाव के लिए ठोस चर्चा शुरू करने का सुझाव भारत की सक्रिय कूटनीति को दर्शाता है। भारत ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि वह वैश्विक संस्थाओं में बदलाव का केवल समर्थक नहीं, बल्कि इस प्रक्रिया में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के लिए भी तैयार है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में भविष्य के वैश्विक शासन को लेकर स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यदि भविष्य ग्लोबल साउथ और विकासशील देशों का है तो भविष्य से जुड़े फैसलों में उनकी भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
उनका जोर इस बात पर रहा कि दुनिया में आर्थिक और तकनीकी शक्ति का संतुलन बदल रहा है। ऐसे में वैश्विक संस्थाओं की निर्णय प्रक्रिया में भी इन बदलावों का प्रतिबिंब दिखाई देना चाहिए।
भारत की ओर से ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मंच से दिया गया संदेश केवल ब्रिक्स देशों तक सीमित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और भविष्य की तकनीकी व्यवस्था में सुधार की मांग के जरिए भारत ने वैश्विक संस्थाओं के सामने व्यापक सुधार का एजेंडा रखा है।
प्रधानमंत्री का जोर इस बात पर रहा कि दुनिया की मौजूदा संस्थागत व्यवस्था को 20वीं सदी की परिस्थितियों के बजाय 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप बनाया जाए।
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता को सफल बनाने में सहयोग देने के लिए सभी सदस्य देशों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि भारत की प्राथमिकता लोगों को केंद्र में रखकर और मानवता को सर्वोच्च महत्व देते हुए ब्रिक्स सहयोग को आगे बढ़ाना रही है।
उन्होंने सदस्य देशों के प्रतिनिधियों का भारत में स्वागत करते हुए कहा कि सभी देशों का सहयोग संगठन की सफलता के लिए महत्वपूर्ण रहा है।
प्रधानमंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान ग्लोबल साउथ के सहयोग से जुड़ा संयुक्त राष्ट्र दिवस पड़ना एक सुखद संयोग है। उन्होंने कहा कि ऐसे अवसर पर वैश्विक शासन में सुधार और विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने की दिशा में निर्णय लेना विशेष महत्व रखता है।
भारत ने इस अवसर को ग्लोबल साउथ की आवाज को और मजबूत करने के लिए इस्तेमाल करने का संकेत दिया।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक शासन सुधार का मुद्दा उठने के बाद अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि 10 प्रस्तावों को किस तरह ठोस रूप दिया जाता है। यदि सदस्य देश इन प्रस्तावों को लेकर सहमति बना पाते हैं तो अगले शिखर सम्मेलन तक ब्रिक्स सुधार रोडमैप तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हो सकती है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में प्रतिनिधित्व, ग्लोबल साउथ की भागीदारी और एआई जैसी नई तकनीकों के लिए नियम बनाने में विकासशील देशों की भूमिका—ये सभी ऐसे मुद्दे हैं जिन पर आने वाले समय में वैश्विक कूटनीति में बहस और तेज होने की संभावना है।
प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन का व्यापक संदेश यही रहा कि बदलती दुनिया के साथ वैश्विक संस्थाओं की संरचना भी बदलनी चाहिए। भारत अब केवल वैश्विक व्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाने की बात नहीं कर रहा, बल्कि ऐसी व्यवस्था की वकालत कर रहा है जिसमें ग्लोबल साउथ की आवाज, प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की शक्ति को भी उचित स्थान मिले।
विशेष- संवाददाता, (प्रदीप जैन)।


